मंगलवार, 24 जुलाई 2007

महिलाएं निर्वस्‍त्र हो चलाती हैं हल


महिलाएं निर्वस्‍त्र हो चलाती हैं हल

महिला हितों व बाल अधिकारों के पक्ष में दुनियाभर के नारीवादी संगठन कितनी ही मोर्चाबंदी करें, चाहे महिला आरक्षण के लिए लाख जतन किए जा रहे हों, मगर ताज सिटी आगरा के निकटवर्ती बाह विकास खंड में बारिश को बुलाने के लिए प्रचलित शर्मनाक परंपरा रोंगटे खड़े कर देने वाली है. यहां तमाम गांवों में बारिश के लिए महिलाएं निर्वस्‍त्र होकर घंटों तक खेतों में हल चलाती हैं और अर्धनग्‍न होकर छोटे बच्‍चे पूरे गांव में दिनभर चिल्‍ला-चिल्‍लाकर भीख मांगते हैं. सदियों से चली आ रही इस परंपरा के बारे में प्रशासन जानकारी से इनकार कर रहा है, जबकि ग्रामीणों ने इसकी पुष्टि की है.
यहां बता दें कि ठहरे हुए मानसून के कारण इन दिनों आगरा व निकटवर्ती क्षेत्रों में आशातीत वर्षा नहीं हुई है. काफी समय से पानी न बरसने से किसान सूखती फसल देख बादलों की ओर टकटकी लगाए हैं. बीते दिनों देहातों में बारिश के लिए टोने टोटके भी आजमाए जाने शुरू हो गए थे. रविवार की रात बाह विकास खंड के जरार कस्‍बे में कुछ महिलाओं ने परिवार के पुरुषों द्वारा तय कार्यक्रम के अनुसार इंद्रदेव को खुश करने के लिए निर्वस्‍त्र होकर खेतों में हल चलाए. इसके बाद घर लौटने पर पुरुषों ने परंपरा के तहत इन महिलाओं को गालियां सुनाईं और उनके बिस्‍तर पर कीचड व गोबर फेंका. इस क्षेत्र में पुरानी मान्‍यता है कि ऐसा करने से हल चलाने के दौरान ही बादल बनते हैं और वर्षा होती है. इसे मात्र संयोग ही कहा जा सकता है कि रविवार देर रात क्षेत्र में कुछ देर बारिश भी हुई.
इसी विकासखंड के चौरंगाहार, अभयपुरा, बाघराजपुरा, हरनाल, चमरउआ, प्रतापपुरा, ऐमनपुरा, भाउपुरा, पातीपुरा, मनसुखपुरा आदि क्षेत्रों में यह शर्मशार करने वाली परंपरा आज भी जारी है. जरार निवासी 63 वर्षीय बुजुर्ग राजेन्‍द्र सिंह ने बताया कि यह परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है. वे बचपन से इसे सुनते आए हैं. महिलाएं सामूहिक हित के नाम पर इस परंपरा का निर्वाह करती हैं, हालांकि नई बहुएं अब इसके प्रति अनिच्‍छा जताने लगी हैं. बिजौली निवासी 69 वर्षीय गजेन्‍द्र सिंह कहते हैं कि खेती में वैसे तो हल का प्रयोग बंद हो गया है और महिलाएं आमतौर पर कृषि कार्य के दौरान हल प्रयोग नहीं करतीं, लेकिन बारिश बुलाने के लिए ऐसा करती हैं. इसके अलावा गांव के छोटे बच्‍चे अर्धनग्‍न होकर पूरे गांव में दिनभर हाय राम प्‍यासे, हाय राम भूखे चिल्‍ला- चिल्‍लाकर भीख मांगते हैं. अनाज को एकांत में किसी खेत पर लेजाकर उपलों की आग में पकाते हैं. नन्‍हे हाथ दाल और मोटी-छोटी रोटी बनाते हैं, जिसे टिक्‍कर कहा जाता है.
बिजौली निवासी 75 वर्षीय बिटौला देवी कहती हैं कि वे खुद कई बार इस परंपरा का निर्वाह कर चुकी हैं. इसमें उम्रदराज महिलाएं आगे चलती हैं और कम उम्र की महिलाएं उनका अनुसरण करती हैं. हालांकि इसका कोई जवाब बिटौला देवी के पास नहीं कि ऐसा करने से बादल कैसे बनते हैं और इन्‍द्रदेव कैसे खुश हो जाते हैं.
रविवार रात जरार कस्‍बे में महिलाओं द्वारा निर्वस्‍त्र होकर हल चलाए जाने की घटना से उपजिलाधिकारी राजपाल सिंह ने अनभिज्ञता जाहिर की है. उनका कहना है कि वे इस क्षेत्र में नए आए हैं और उनको ऐसी परंपरा की कोई जानकारी नहीं है.

4 टिप्‍पणियां:

Anil Arya ने कहा…

शर्मनाक है यह.. कहॉ सो रहे हैं तथा कथित नारीवादी संगठन ! बाल अधिकारों की लंबी लंबी हांकने वाले ! सरकार -प्रशासन ! क्यों चुप रहते हैं ? परम्परा के नाम पर हम कब तक कुरीतियों को झेलते रहेंगे ! ज्ञान- विज्ञानं के इस दौर में भी यदि ऐसा होता है तो यह बेहद चिंतनीय है!

Udan Tashtari ने कहा…

जहां तक मुझे ख्याल आता है ऐसी ही कुछ परंपरा मालवा अंचल मध्यप्रदेश के कुछ भागों में भी प्रचलित है.

36solutions ने कहा…

जानकारी यहा उपलब्ध कराने के लिये धन्यवाद !

Pratik Pandey ने कहा…

विशेष भाई, ऐसी कई बुद्धिहीन प्रथाएँ हमारे देश में प्रचलित हैं। भारत का चिंतन तार्किक न होकर रुढ़िबद्ध है। जब तक भारतीय मानस में वैज्ञानिक चिंतन नहीं उपजता, बेचारा प्रशासन कहाँ-कहाँ क्या-क्या करेगा।