रविवार, 20 मई 2007

सोशल इंजीनियरिंग का सच : ज्ञान दत्‍त पांडेय जी की प्रेरणानुसार

उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम आते ही प्रचार माध्‍यमों के सुर सबसे पहले बदले. इस दौरान सोशल इंजीनियरिंग शब्‍द सबसे ज्‍यादा चर्चा में आया. अपने पिछले चिट्ठे उत्‍तम प्रदेश प्राइवेट लिमिटेड में मैने मायावती के लिए मार्केटिंग गुरू शब्‍द का इस्‍तेमाल किया था. इस ओर साथियों की कोई सह‍मति या असहमति प्राप्‍त नहीं हुई. इसके बाद कई चिट्ठों पर मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की तारीफों के पुल बांधे गए. अपने ज्ञान दत्‍त पांडेय जी भी कुछ लिखे थे. इस शब्‍द सोशल इंजीनियरिंग का तटस्‍थ आकलन किया जाना बहुत जरूरी है.
दरअसल इस वक्‍त यह बात पूरी तरह नजरंदाज की जा रही है कि इस बार बहुजन समाज पार्टी की अप्रत्‍याशित जीत के पीछे एक लंबा होमवर्क कारगर रहा. मायावती ने ब्राह्मण कार्ड खेलने से पहले अपने सहयोगियों के साथ काफी ऑफिस वर्क किया. पिछली हार के कारणों की समीक्षा की गई. यूपी के हर विधान सभा क्षेत्र के जातिगत आंकड़ों व पार्टी को मिले मत प्रतिशत का अध्‍ययन किया. यह देखा गया कि जहां पिछली बार बसपा प्रत्‍याशी हारे, वहां अन्‍तर कितना रहा और इस बार उसे कैसे पाटा जा सकता है.
पूरे प्रदेश में तकरीबन सभी जगह ब्राह्मण मतदाता इतनी संख्‍या में हैं कि वे चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं, मगर आज तक किसी ने उनके संगठित उपयोग के बारे में नहीं सोचा. भाजपा लंबे अरसे तक हिन्‍दुत्‍व की राजनीति करती रही, लेकिन वह वैश्‍य व ठाकुर मतदाताओं की खैरख्‍वाह बनकर रह गई. पहली बार मायावती ने ब्राह्मणों को उनकी राजनैतिक ताकत का अहसास कराया. मायावती ने इस ताकत का अपने पक्ष में सुविधाजनक उपयोग किया. जहां ब्राह्मण कार्ड खेलकर लाभ अधिक होना था, वहां ब्राह्मण प्रत्‍याशी उतारे गए. इनमें कई तो ऐसे थे जिनकी कोई राजनीतिक पृष्‍ठभूमि तक नहीं है. मायावती के पास अपने परंपरागत वोटर से कहीं भी वोट डलवा सकने की क्षमता है. यही मायावती ने किया भी. नीले खेमे के मतदाताओं ने उनके प्रत्‍याशियों पर भरोसा दिखाया. यह भी ध्‍यान देने योग्‍य है कि हर जगह ब्राह्मण कार्ड नहीं खेला गया. जहां यादव, जाटव, जाट, कायस्‍थ या अन्‍य उनके समीकरण में फिट बैठते ही, वहां उनका उपयोग किया गया.
जल्‍दबाज मीडिया ने इसे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दे दिया. सोशल इंजीनियरिंग के निहितार्थ समाज के सभी वर्गों को समभाव के जरिए जोड़ना होना चाहिए, मगर यहां ऐसा कुछ नहीं है. यहां सिर्फ सर्वजन का उपयोग कर राजनीति पर काबिज होना एकमात्र उद्देश्‍य रहा, जिसे नजरंदाज किया जाना भारी भूल होगी. वैसे जनता स्‍वभाव से ही भुलक्‍कड़ होती है. ये वही मायावती तो हैं, जिन्‍होंने तिलक तराजू और तलवार.... का नारा देकर दलितों को आपस में जोड़ा था. इसी जन्‍म में मायावती को ऐसी सदबुद्धि कहां से आ गई कि वे सर्वजन की बात करने लगीं. यह विशुद्ध दोगलापन है.
यह जान लेना भी रोचक होगा कि प्रदेश में कूल 46 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाले. इनमें से करीब 30.3 प्रतिशत वोट मैडम के हिस्‍से आया और वे जीत गईं 208 सीटें. यानी माया मेमसाहब की पार्टी इस वक्‍त यूपी के कुल 13.5 प्रतिशत मतदाताओं को साथ लेकर यूपी की सरमाएदार बन गई हैं. इस तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग का एक पहलू यह भी है कि इस चुनाव में नीले खेमे का मत प्रतिशत केवल 5 प्रतिशत बढ़ा है.

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, मायावती ने चुनाव से पहले काफी ऑफिस वर्क किया है. यह स्‍वीकार किया जाना चाहिए कि वर्तमान चुनाव वह बेहतर मार्केटिंग व प्रबंधन के दम पर जीती हैं. सोशल इंजीनियरिंग के तथाकथित लिफाफे में उन्‍होंने तमाम मसाले मिक्‍स कर पब्लिक के सामने पेश किया. अपने ब्रांड का उन्‍होंने ऐसा प्रचार किया कि उनका माल लोगों ने एक बार आजमाना चाहा. हमें ध्‍यान देना होगा कि उपलब्‍ध तमाम संसाधनों का अपने पक्ष में सुविधाजनक उपयोग बेहतर प्रबंधन है ना कि सोशल इंजीनियरिंग.


हां, एक बात के लिए माया मेमसाहब काबिले तारीफ हैं कि उन्‍होंने कांशीराम द्वारा परिकल्पित दलितों की राजनीतिक भागीदारी के तथ्‍य को मैकेनिज्‍म दिया. अगर डा. अंबेडकर ने दलितों को कानूनी अधिकार दिलाए हैं तो कांशीराम ने राजनीति में भागीदारी दिलाने का प्रयास किया है. यह मायावती ही हैं, जिन्‍होंने कांशीराम के तथ्‍य को धरातल पर उतारने का काम किया है. मगर जो सोशल इंजीनियरिंग उन्‍होंने की ही नहीं, उसका श्रेय उन्‍हें नहीं दिया जाना चाहिए.

3 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ल ने कहा…

आपकी बात में दम है!

Gyan Dutt Pandey ने कहा…

मायावती ने अपनी सुविधा के लिये एक संश्लेषण किया है. पर सिंथिसिस के बाद जो आता है वह बहुधा जर खरीद गुलाम नहीं रहता. फिर यह नहीं कि सारा दिमाग मायावती के पास ही है. और पार्टियों में भी धाकड़ सिंथिसिस करने वाले हैं. आगे इस पर अनेक प्रयोग होने चाहियें. रोचक होगा भविष्य को मोल्ड होते देखना.
आपने बड़ी मेहनत से और बड़ा अच्छा लिखा है.

ANUJ KUMAR TARUN ने कहा…

pande ji aap ki yaadst thik hai es liye tilk talwar wali baat yaad hai par aap thotha v ahshas nahi hai ki dalito ne pandito ke sabhi shoshan bhul kar pandito ko jeetaya.dalit sab bhul kar aap se dosti kar raha hai par aap use hi upshavd kaah rahe hai manshikta badlne ki jarurat hai aap ko badlna chahiye